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वादे जो सड़क के नीचे से बहती सीवरेज के अंदर से होते हुए हर बरसात के बाद बहते हुए नालियों में बह गए..और जब आज के जैसे थोड़ी बहुत बरसात ज्यादा हो तो पानी के साथ सीवरेज से निकल कर सड़कों के ऊपर भी पैदल चलती जनता के पैरों के नीचे आ गए..और साथ ही जो वादे यहां जनता के लिए किए गए थे वह उन्हीं की नीची दुकानों (सड़क से) और नीचे घरों(ऊंचे स्थानों से) में भी घुस गए..जनता बस जनप्रतिनिधियों को कोसती रही और अपने जरूरी सामान को उन वादों से भरे पानी से निकालती रही और उन्हें यह डर भी घण्टों सताता रहा कि उनका कोई सामान इन वादों के साथ नालियों में न चला जाए…
उनके लिए आज इस भारी बरसात के बाद का मौसम बड़ा सुहाना रहने वाला है..वादों के ऊपर बने बड़े घरों में गर्म चाय और पकोड़ों के आदेश दिए जाएंगे…साथ बैठ कर उनका आनंद लिया जाएगा और बारिश से भीग कर ठंडे हो चुके मिट्टी के टीबों पर महंगी शराब की बोतलें खोली जाएंगी.. लेकिन वादों से त्रस्त और बरसात से अस्त व्यस्त हो चुकी आम जनता बरसात रुकने के बाद अपने घर और घर को चलाने वाले अपने डुब चुके कार्यस्थल को सुखाने में लगे होंगे घर को सोने के लिए ठीक करते होंगे…
बात केवल अपने स्तर की होती तो कोई बात नहीं थी परंतु यह तो हर महानगर, जिले और गांव की समस्या है..चाहे दिल्ली में बारिश के बाद लगी 15 किलोमीटर लंबी यातायात की लाइन हो या मुम्बई जैसे बड़े महानगर (सपनों की नगरी) बरसात के कारण नाले में गिरती वृद्ध महिला..या UP जैसे विकास मॉडल राज्य में नई झक्कास सड़क पर बनते गड्ढे या फिर लूणकरणसर जैसे छोटे-मोटे गांव में कोई सरकारी दीवार गिरना… लिस्ट लम्बी और खिंचती चली जायेगी लेकिन सरकारी आंखों के सामने यह कुछ भी नहीं है।
