#लुनकरनसर स्टेशन के पास की बड़ी पानी की टंकी धीरे-धीरे पीछे छूट रही थी और गाड़ी अपने अगले स्टेशन की तरफ बढ़ना शुरू हो गई थी। थोड़ी देर के बाद गांव से दूर और खेतों के बीच से रफ्तार पकड़ती जा रही ट्रेन यहां के बादलों को ओझल करती जा रही थी।
इंजन के धुएं के काले बादल पीछे छूट रहे थे और साथ में थे तो सहयात्री…एक स्टेशन पहले भाल के चेहरे पर जो खुशी थी वो अब दिखाई नहीं दे रही थी..अपने गले में डली गणेश जी की मूर्ति को घुमाते हुए वो विचारों के समंदर में डूबी नजर आ रही थी…
मेर साथ की सीट जो इतनी देर खाली थी अब उस पर #नाथवाना स्टेशन से चढ़े एक बुर्जुग अपने जान पहचान युवक के साथ अपनी बातों मगन थे जो की एकल सीट पर बैठा था…और थोड़ी देर में मैं और भाल खिड़की से पीछे छूटती दुनिया को निहार रहे थे…बुजुर्ग ने सीट के सबसे ऊपरी हिस्से पर अपना सिर रखा और यात्रा की नींद में खो गए।
#मलकीसर का रेलवे स्टेशन सज संवर रहा था मतलब निर्माण कार्य प्रगति पर था.. ट्रेन रुकते ही कचोरी, कुल्फी, पानी ठंडा आदि आवाजें आने लगी और वो अपने डब्बे बदलते नजर आने लगे…यहां से एक युवक और महिला चढ़े उन्होंने बैठने के लिए मेरे पास में सीट की कॉर्नर पर बैठे बुजुर्ग को जगाया जो की सामने वाली सीट पर पैर रखकर सो रहे थे…युवक के बठते ही बुजुर्ग ने जानकारी के लिए सवाल फैंक मारे एज युजवल, पता चला की वो भी अपने ननिहाल जा रहा था अपनी मां के साथ पीलीबंगा। भाल ने भी महिला को बता ही दिया की वो भी पीलीबंगा जा रही है और वहीं की है ननिहाल आई थी सो ऑन…आगे बढ़ती ट्रेन की खिड़कियों से हरेभरे खेतों में नीनाण निकलते किसान नजर आए..मेरे और बुजुर्ग के बीच बैठा युवक यूट्यूब में मस्त हो चुका था…बिना कुएं के खेत बारिश होने के बाद बोए हुए नजर आ रहे थे मतलब की सीधी मिट्टी के नजारे और दूर-दूर तक गोल्डन बालू मिट्टी के टिब्बे।
#महाजन मतलब चाय, कचोरी, पकोड़ी ठंडा पानी की बोतल एएएए की आवाजें…यह स्टेशन मेरे दूसरे साइड वाली खिड़की पर था…पुरानी याद है यहां स्टेशन पर एक दुकान वाले ने मेरे से तीस रुपए ऐंठ लिए थे…और एक लाल स्लेटी कलर की ट्रेन बिना रुके पास वाली पटरी से दौड़ती चली गई पता नहीं कौनसी ट्रेन थी…ट्रेनों का इतना अनुभव नहीं है मुझे, साल में एक या दो बार ट्रेन से यात्रा करनी होती है तो इस डिजिटल दुनिया में व्हेयर इज माई ट्रेन नामक एक छोटे पैक में बड़ा धमाका वाले एप काम आ जाते हैं। ट्रेन अभी भी पता नहीं किसका इंतजार कर रही है? यहां की पकोड़ियों में नमक स्वाद में ज्यादा लगने के बाद भी आप उन्हें खाए जा रहें हैं मतलब आपके जीभ और दिमाग और वैसा ही स्वाद चाहिए…लगभग 15 मिनट के बाद एक और दौड़ती हुई ट्रेन दिखने में बिल्कुल पहले वाले जैसी ही लग रही थी लेकिन स्पीड बहुत ज्यादा थी दूसरी पटरी से निकल गई उसके बाद हमारी ट्रेन चली।
महाजन जब ट्रेन से उतर कर जब पकोड़ी लेने गया था तो हमारे पिछले डब्बे में एक #ट्रांसजेंडर थी (पाठक उचित मार्ग दर्शन देवें)। आते वक्त मुझे उनके (कम्यूनिटी के) बारे में पुरानी सारी बातें याद आ गई जो गलत या सही हो सकती हैं लेकिन ऐसा बर्ताव मेरे साथ कभी नहीं हुआ जो सुन रखा था। #मलकीसर स्टेशन पर भीड़ बहुत कम थी कोई इक्का दुक्का सवारी थी और बाकी उनको यहां तक छोड़ने आए लोग..ट्रेन यहां से चले उससे पहले वो ट्रांसजेंडर हमारे वाले डब्बे में आ गई थी और वही ख्याल सेकेंडों में मेरे दिमाग से गुजर रहे थे…मेने जेब से 20 का नॉट निकाला तो भाल बोली मैं दे दूंगी उनको आप मुझे दो पैसे मैंने दे दिए…पिछली दो सीटों की लाइनों को पूरा जब हमारी लाइन में आई तो देखा इनकी उम्र 25 से 30 के बीच रही होगी, कानों में बड़ी-बड़ी बालियां, आईब्रो से ऊपर तक जाता काजल और छाती पर बना टेटू…मुझे पता नहीं इस मतलबी समाज ने उनके साथ ऐसा बर्ताव क्यों किया मतलब की इनको अलग थलग क्यों किया गया इनको? सभी ने ही 20 20 के नॉट दिए उन्होंने सभी को आर्शीवाद दिया बुजुर्ग से लेने को मना कर दिया लेकिन बुजुर्ग ने भी दिए, उन्होंने 10 रुपए वापिस देने की कोशिश की लेकिन बुजुर्ग ने नहीं लिए और वो आगे बढ़ गई….
#राजियासर रेलवे स्टेशन के हाल अभी भी बेहाल ही नजर आ रहें हैं पता नहीं कब इसका भाग्य खुलेगा…स्टेशन पर भीड़ भी उतनी नहीं हैं…एक गाय यहां लगे पेड़ों को नीचे से एक जैसा करने में लगी है जहां तक वो पहुंच पा रही है और एक नंदी स्टेशन पर आराम कर रहा है…बाकी पूरे स्टेशन पर बिखरे हुए नीम के पत्ते और ग्रिट नजर आती है… यहां से निकलते ही पटरी की ऊंचाई से नीचे खेत और आगे ट्रेन से भी ऊपर रेत के टिब्बे…इनको देखकर लगा की #गदर फिल्म के ट्रेन चेस की शूटिंग यही हुई थी…
#बिरधवाल का स्टेशन दूसरी तरफ था यहां से कुछ खास देख नहीं पाया और ना ही ट्रेन ज्यादा रुकी…यहां से निकलते ही आई नहर जिसके ऊपर से गुजरती ट्रेन की आवाज बिलकुल ही बदल जाती है… नहरबंदी के दौरान निकाली गई मिट्टी का ढेर काफी बड़ा था…
#सूरतगढ़ में घुसते वक्त जो पहले दूर दूर तक टिब्बे नजर आते थे वहां अब मकान बन गए और बन रहे हैं वहीं दूसरी तरफ दूर तक सीधी सड़क नजर आती थी अब उससे पहले शहर के कचरे अटा मैदान नजर आता है। सूरतगढ़ स्टेशन के अंदर से अपने पशुओं के हरा कचरा ले जाती महिलाएं और अब तक की सबसे अधिक भीड़ और चाय कचोरी समोसे बेचने वालों की सबसे ज्यादा आवाजें।
#राजस्थान का कितना असर #पंजाब में नजर आता पता नहीं लेकिन सूरतगढ़ में घुसते ही आपको पंजाब का असर नजर आने लगता है… #श्रीगंगानगर और #हनुमानगढ़ में सबसे अधिक असर देखने को मिलता है… और यहां सब कुछ बदला बदला लगता है अलग बोलने का ढंग सब कुछ…12:44 पर ट्रेन रवाना हुई #अनूपगढ़ से आई ट्रेन के यात्रियों को लेकर…उसके बाद विलुप्त हो चुकी #घग्घर नदी के ऊपर से गुजरती ट्रेन से नीचे देखना थोड़ा अजीब लगता है…जब मैं छोटा था तो एकबार दादू के साथ जब भुआजी के यहां गया था उस समय याद है कुछ पानी था उसमें लेकिन अब इसमें एक बेल जैसा कुछ उगा हुआ था…पानी इसमें तो नहीं लेकिन आस पास सेम से इक्कठा हुआ था उसके ऊपर हरी काई….एक जगह भैंस भी नहा रही थी…
#रंगमहल आते ही चार औरतों में से एक उतर चुकी थी जो सूरतगढ़ से चढ़ी इनकी किट्टी टॉक अब थोड़ी शांत थी…यहां दूसरी पटरी पर एकमाल गाड़ी खड़ी थी जिसके इंजन का कलर मुझे आर्मी गाड़ी जैसा लगा…इंजन के ऊपर देखा तो पता चला यह तो लाइट से वाली ट्रेन है…लेकिन उसका इंजन तो बंद पड़ा था पता नहीं क्यों..
#अमरपुरा राठान आते आते ईंटों के भट्टों की चिमनियां दिखने लगी और नजर आने लगे बहुत सारे हरे भरे खेत…इस स्टेशन पर कब ट्रेन रुकी कब चली पता ही नहीं चला और अब हमारे डब्बे में आ चुका था एक रावण हत्था बजाने वाला कलाकार, जिसकी धुन पर बज रही थी गदर फिल्म की ट्यून उड़ जा काले कांवा…उसके साथ थी एक छोटी बच्ची थी जो अपनी इस कला के लिए पैसे इक्कठे कर रही लोगों (मांग रही थी) सामने की सीट पर बैठे भाईसाहब जो ज्ञानी थे उन्होंने मारी ज्ञान की एक दो बातें ऐसे नहीं होना चाहिए वैसे नहीं होना चाहिए।
और आ चुकी थी हमारी आज की मंजिल पीलीबंगा, हमें लेने आया Nitesh Yogi और रास्ते में व्यस्त दिखा Anil Yogi । घर जाकर थोड़ा आराम किया होटस्टार पर The Good Dinosaur 
मूवी निपटाई और शाम की चाय बड़ी भुआजी के घर पी कर छोटी भुआजी के घर गया थोड़ी बातें हुई और थोड़ी सी शिकंजी बाद बड़ी भूआजी जी के पास शाम खाना खा कर 7:24 पर मैं फिर से #yellowcity के स्टेशन पर था टिकट कटवाने के बाद प्लेटफार्म पर पहुंचा तो पेड़ के नीचे लगी सीट के पास एक युवक अपने आराध्य से प्रार्थना कर रहा था, अपने सिर पर रूमाल लगा रखा था जूते और मौजे उतार रखे थे और हाथ जोड़ रखे थे।
थोड़ी देर बाद धरती मां को छू कर नमस्कार कर अपनी प्रार्थना पूरी की। ऐसे दृश्य आजकल देखने को नहीं मिलते जहां लोग अपने आराध्य की प्रार्थना ऐसे करते हुए दिखें। ट्रेन आने की अनॉसमेंट हो चुकी थी।
ट्रेन ने अब अपनी रफ्तार पकड़ी और अब पीछे छूट रही हैं आज की थोड़ी यादें, खेतों में पानी की भरी कियारियां, उनमें खड़ा युवक, मच्छरदानी में बंधे (खूंटे से) जानवर। भिड़ बहुत ज्यादा थी पीछे से ही…बैठने की जगह नहीं…एक नशे से धुत युवक बैठा था गेट पास और ट्रेन के अनजान हमसफर।
पहले सोचा था की इस भिड़ से सूरतगढ़ में छुटकारा मिलेगा लेकिन यहां तो बढ़ गई भिड़ और अब साफ साफ नजर आ रहा था की पूरे रास्ते इसी तरह खड़े होकर ही यात्रा करनी होगी।
ट्रेन में सूरतगढ़ से चढ़े राजेश (हाथ पर टेटू पढ़ा था) की बर्थ पर सो रहे व्यक्ति से थोड़ी अनबन हुई, पहले वो बोला खाना खा कर जगह दूंगा लेकिन बाद में बदल गया, बोला मैं ही अकेला हूं क्या जो सो रहा हूं आदि आदि इत्यादि…थोड़ी देर बाद उसके पैर जवाब देने लगे और थक कर बैठ गया…थोड़ी देर बाद मैंने भी पैरों को थोड़ा आराम देने की सोची और बैठा..पर दर्द कर रहे थे नींद की एक झपकी लगी और फोन बज गया…उसके बाद रेलवे वाला पानी कोल्ड ड्रिंक की आवाज लगाते आ पहुंचा। और उससे लेकर पानी पिया उतनी देर में महाजन भी आ गया। पास में बैठी एक बुजुर्ग महिला ने खाना खाने के बाद सबसे जरूरी दवाई ली (पता नहीं कौनसी ब्रांड का जर्दा और चुना मिलाया एक अंगुली से दिए दो धक्के और उसको उसकी तय सीमा पर पहुंचा दिया)।
करीब 9:50 पर अपने स्टेशन पर, वहां खड़े थे Sanwarmal Sarswat जो इसी ट्रेन में अपनी यात्रा करने वाले थे। मैं ट्रेन से उतरा और रवाना अपने आशियाने की तरफ। इतना सफर खड़े होकर तय करने के बाद भी मुझे घर पैदल जाना था।
धन्यवाद।
