जहर केवल जहरीले जनवरों या कीटनाशक दवाओं में ही नहीं होता, कुछ इंसानों के विचार भी जहरीले होत्ते है। जिससे उनका आचरण और भाषा भी जहरीली हो जाती है…जब कोई जहरीला जीव किसी इंसान या किसी अन्य जीव को अपने जहर से नुकसान पहुंचाता है तो विज्ञान के पास उसका इलाज होता है लेकिन जब किसी जहरीले विचारों वाला इंसान किसी को नुकसान पहुंचाता है तो उसका इलाज थोड़ा मुश्किल ही मिल पाता है।
इंसान की मौत होना दोनों परिस्थितियों में तय है…अगर जहर उसके शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता ज्यादा हो और दूसरे मामले में सहन शक्ति कमजोर हो। लेकिन जब जहर रोगप्रतिरोधक क्षमता और सहन शक्ति से ज्यादा ताकतवर हो तो…?
मैंने अपना पिछला कुछ समय इन दोनों परिस्थितियों के बीच गुजारा है…और फिलहाल ठीक हूँ….आप भी खुद को अपनों को इन जहरीले जीवों और विचारों से दूर रखिये
